मध्यप्रदेश में जलने को तैयार चिताओं पर लेटे मासूम बच्चे और आदिवासी महिलाएं

By khabar1stofficial@gmail.com

Updated On:

Date:

मध्यप्रदेश छतरपुर/पन्ना से दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना के केंद्र ‘धोड़न डैम’ पर बीते अप्रैल से अभी तक आंदोलन जारी है, लोग चिताओं पर लेट रहे हैं हर छोटा बड़ा बूढ़ा महिलाएं सब हर एक तरीके से आंदोलन कर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना चाहते हैं कभी वह चिता आंदोलन कर रहे हैं तो कभी वह जल समाधि आंदोलन कर रहे हैं कभी वह भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं तो कभी पैदल यात्रा कर रहे हैं लेकिन बीते अप्रैल से अभी जुलाई तक उनकी बातों को किसी ने नहीं सुना , और उनके आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों को प्रशासन जेल में डाल रही है ,तो कभी लाठियां बरसा रही है हालांकि एक बार फिर अब हजारों आदिवासियों ने अपनी चिताएं सजा लीं। यह महज प्रदर्शन नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन के लिए ‘सामूहिक आत्मदाह’ की चेतावनी है।

धोड़न डैम की जमीन पर मौत का तांडव या न्याय की गुहार?
धोड़न डैम पर दर्जनों चिताएं सजाई गई हैं, जिन पर आदिवासी महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों को लेकर लेट गई हैं। उनकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश है।

वहां के आंदोलनकारी का कहना है: अब समझौता नहीं, सीधे कार्रवाई की मांग

चिताओं पर सत्याग्रह: सैकड़ों महिलाएं और किसान धोड़न डैम की उसी जमीन पर चिताओं पर लेटे हैं, जिसे उनसे छीना जा रहा है। उनका कहना है कि “प्रशासन हमें उजाड़ने से पहले इन्हीं चिताओं पर जला दे।”

अमित भटनागर की रिहाई की मांग भी जारी है: ग्रामीणों का एक ही नारा गूंज रहा है— “अमित भटनागर को रिहा करो, या हमें अग्नि के हवाले करो।
उधर प्रशासनिक सन्नाटा दिखाई दे रहा है: इतनी बड़ी घटना के बावजूद उच्च अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना आदिवासियों के गुस्से को और भड़का रहा है।
“जिसके कारण आदिवासियों का कहना है किहमारी कब्र पर बनेगी यह परियोजना”

आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं दिव्या अहिरवार ने चिताओं के पास से गरजते हुए कहा:
“यह सरकार बहरी हो चुकी है। धोड़न डैम की नीवं हमारे पूर्वजों की हड्डियों पर रखी जा रही है। अगर अमित भटनागर की रिहाई और विस्थापितों के हक की बात नहीं हुई, तो आज इन चिताओं से उठने वाला धुआं इस सरकार की विदाई का संकेत होगा।”

ग्राउंड जीरो के हालातकी बात करे तो
मौके पर हजारों की भीड़ मौजूद है। गांव-गांव से लोग पैदल चलकर धोड़न डैम पहुंच रहे हैं। पुलिस बल की तैनाती तो है, लेकिन आदिवासियों के ‘बलिदान’ वाले जज्बे के आगे प्रशासन बेबस नजर आ रहा है।

हालांकि पन्ना का यह संघर्ष अब केवल एक बांध का विरोध नहीं रहा, बल्कि आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। यदि जल्द ही संवाद नहीं हुआ, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

Leave a Comment